दुर्ग । मुख्यमंत्री के दो वर्ष पूरे होने पर दुर्ग में मेगा कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। मंच भव्य होगा, भाषण दमदार होंगे, बधाइयों की बारिश होगी और उपलब्धियों के पुल भी बांधे जाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता भी उतनी ही खुश है जितनी तस्वीरें और पोस्टर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं?
“दो साल की सरकार, लेकिन दुर्ग को मिला क्या? लोकार्पण 11 करोड़ का और भूमिपूजन 248 करोड़ का!”
दुर्ग में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में मात्र 11 करोड़ रुपये के कार्यों का लोकार्पण और 248 करोड़ रुपये के कार्यों का भूमिपूजन हो रहा है। आंकड़ों की यह बाजीगरी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। आखिर दो साल की सरकार के बाद जनता को ज़मीन पर कितना विकास मिला और कितना केवल शिलान्यास के पत्थरों में कैद है?
गुटबाजी का पुराना रोग, सत्ता बदली लेकिन बीमारी नहीं
कभी कांग्रेस सरकार गुटबाजी की भेंट चढ़ी थी। आज भाजपा सत्ता में है, लेकिन हालत देखकर लगता है कि इतिहास दोहराने की तैयारी कर रहा है।
“ट्रिपल इंजन सरकार के तीनों इंजन अलग-अलग दिशा में दौड़ते दिखाई दे रहे हैं।”
दुर्ग नगर निगम की स्थिति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महापौर और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच टकराव किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में निगम की बैठक में अधिकारियों पर गाज गिरी, लेकिन व्यवस्था में सुधार कहीं दिखाई नहीं दिया। विधायक समर्थक पार्षदों और अलग-अलग राजनीतिक खेमों की लॉबिंग ने सत्ता के गलियारों को विकास से ज्यादा खींचतान का अखाड़ा बना दिया है।
भाजपा संगठन के पास नेतृत्व की कमी नहीं है। सांसद हैं, विधायक हैं, महापौर हैं, संगठन के पदाधिकारी हैं। कमी है तो केवल समन्वय की।
परिणाम यह है कि प्रशासनिक अधिकारी राजनीतिक खींचतान का लाभ उठाकर अपनी सुविधानुसार काम कर रहे हैं। विकास कार्यों की गुणवत्ता हो, सफाई व्यवस्था हो या जनसेवाओं का मामला—हर तरफ सवाल खड़े हो रहे हैं।
📦 सवालों के घेरे में टैक्स वसूली और निगम प्रशासन
भाजपा की “जीरो टॉलरेंस” नीति दुर्ग में कागजों तक सीमित नजर आती है।
निगम टैक्स वसूली में अनियमितताओं के आरोप वर्षों से चर्चा में हैं। पुरानी आउटसोर्सिंग कंपनी द्वारा वसूले गए टैक्स की जांच आज तक अधूरी है। इससे भी गंभीर बात यह कि उसी कंपनी के एजेंटों की गतिविधियों की चर्चाएं आज भी जारी हैं।
“जब जांच पूरी नहीं होती और वसूली की चर्चाएं बंद नहीं होतीं, तब सवाल उठते हैं कि आखिर संरक्षण किसका है?”
PM आवास योजना: गरीबों के सपनों की अधूरी इमारत
प्रधानमंत्री आवास योजना (AHP) की हालत भी किसी अधूरी कहानी से कम नहीं। जिन आवासों का सपना गरीबों को वर्षों पहले दिखाया गया था, वे आज भी कई जगह अधूरे पड़े हैं।
कुछ ठेकेदारों को दिखावे के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया, लेकिन पीछे के दरवाजे से काम फिर उन्हीं तक पहुंच गया।
यदि यह सच है तो फिर कार्रवाई और जवाबदेही केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई है।
अपने ही महापौर के खिलाफ अपने ही पार्षद
सफाई व्यवस्था का हाल किसी से छिपा नहीं। हालत यह है कि विपक्षी पार्षदों को छोड़ दीजिए, भाजपा के अपने पार्षदों ने ही सामान्य सभा में महापौर के बजट भाषण का विरोध कर दिया।
“जब विरोध विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के पार्षद करने लगें, तो समस्या व्यवस्था में होती है।”
यह केवल असहमति नहीं थी, बल्कि सत्ता के भीतर बढ़ती असंतुष्टि का सार्वजनिक प्रदर्शन था। आश्चर्य की बात यह है कि पार्टी संगठन ने आज तक कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझा।
📦 विकास की गति या विकास का इंतजार?
सबसे बड़ा सवाल विकास की गति पर है।
दो वर्षों के शासन के बाद यदि मुख्यमंत्री के सबसे बड़े कार्यक्रम में केवल 11 करोड़ रुपये के कार्यों का लोकार्पण हो रहा है, तो यह उपलब्धि कम और चिंता का विषय ज्यादा प्रतीत होता है।
जनता यह जानना चाहती है कि घोषणाओं की लंबी सूची में से धरातल पर आखिर कितना उतरा?
सौंदर्यीकरण बनाम जनता की सुविधा
दुर्ग शहर की सड़कों का हाल भी किसी प्रयोगशाला से कम नहीं। पटेल चौक से स्टेशन रोड तक दोनों ओर अतिक्रमण है। सड़क पहले ही सिकुड़ी हुई है, ऊपर से बीच में चौड़े डिवाइडर और फैंसी ग्रिल लगाकर अधिकारियों ने शायद सौंदर्यीकरण का नया मॉडल पेश किया है।
“जाम पहले था, अब जाम के साथ फैंसी ग्रिल भी है।”
नतीजा यह है कि ट्रैफिक की समस्या और बढ़ गई। अब तो कुछ जगहों पर लोग ग्रिलों के भीतर ही दुकानें सजाने लगे हैं। जनता जाम में फंसती है और अधिकारी फाइलों में शहर को स्मार्ट बताते हैं।
भाजपा कार्यालय के सामने भी अतिक्रमण, फिर कार्रवाई किस पर?
विडंबना देखिए कि भाजपा कार्यालय के आसपास तक अतिक्रमण वर्षों से कायम है। ट्रिपल इंजन सरकार के बावजूद कार्रवाई नहीं हो पाती।
जब सत्ता के दरवाजे के सामने की समस्या नहीं सुलझ पा रही, तो आम नागरिक की परेशानी का अंदाजा लगाया जा सकता है।
निष्कर्ष : जनता सब देख रही है
भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय है। सत्ता का नशा हमेशा नहीं चलता। जनता सब देख रही है। पोस्टर, बैनर और भूमिपूजन के पत्थर कुछ समय के लिए माहौल बना सकते हैं, लेकिन सच्चाई सड़कों, अधूरे आवासों, जाम और भ्रष्टाचार के आरोपों में दिखाई देती है।
“यदि अगले तीन साल भी ऐसे ही निकल गए, तो 2028 में जनता यह पूछ सकती है कि ट्रिपल इंजन सरकार विकास की गाड़ी खींच रही थी या तीन दिशाओं में भागकर उसे पटरी से उतार रही थी?”
कुछ दर्द बताए हैं, कुछ अभी छुपाए हैं,
हाल इतना बुरा है कि लफ़्ज़ भी घबराए हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता बहुत देर तक इंतजार करती है, लेकिन हमेशा इंतजार नहीं करती।
