
पौराणिक युग से जुड़ा है दुर्ग जिले का इतिहास ? – गौ तीर्थ का अनूठा रहस्य 🌟
भारत की पावन भूमि में कई ऐसे स्थल हैं जिनका संबंध हमारे पौराणिक इतिहास से है। दुर्ग जिला उनमें से एक है, जहां गायों के खुरों के निशान और गौ तीर्थ का खास महत्व है। विशेष रूप से दुर्ग जिले में कई गांवों के नाम नंदिनी गाय से जुड़े हुए हैं, जो हमें एक गहरी ऐतिहासिक कड़ी का आभास कराते हैं।
दुर्ग में गो-तीर्थ के चिन्ह और नंदिनी गाय से जुड़े गांवों के नाम 🌾
दुर्ग जिले में नंदिनी, खुदनी, नंदवाय, नंदेली, नंदौरी, नंदकट्ठी, अहिरवारा और गो पापमोचक कुंड बानबरद जैसे गांव हैं। इन गांवों के नाम पौराणिक कथाओं से जुड़े प्रतीत होते हैं, जो नंदिनी गाय के नाम से ही जुड़े हैं। यहाँ शिवनाथ नदी के किनारे पत्थरों पर गायों के खुर के निशान देखे जा सकते हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि यह क्षेत्र पौराणिक काल में गो-तीर्थ रहा होगा।
अहिवारा क्षेत्र का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व 🏞️
दुर्ग जिले के अहिवारा में कई ऐसे गांव स्थित हैं जो गाय और अहिर समुदाय के पौराणिक महत्व को दर्शाते हैं। यहां के लोग मानते हैं कि इसी क्षेत्र में राजा दिलीप ने अपनी नंदिनी गाय को चराया था, जिससे जुड़े खुर के निशान आज भी पत्थरों पर देखे जा सकते हैं। इसी तरह, बानबरद गांव का नाम बाणासुर से जुड़ा हुआ है, जो पौराणिक कथा में भगवान कृष्ण की गायों का संहार करता था। यहाँ चतुर्भुज भगवान विष्णु का प्राचीन मंदिर और गो पापमोचक कुंड स्थित है, जो गौ हत्या से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है।
गो पापमोचक कुंड की कथा 🕉️
गो पापमोचक कुंड एक विशेष धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि यदि किसी को गौ हत्या का दोष लग जाए, तो इस कुंड में स्नान कर 21 दिन का अनुष्ठान करने से उसे इस पाप से मुक्ति मिल जाती है। यह कथा त्रेतायुग के राजा बाणासुर से जुड़ी है, जिसने भगवान कृष्ण की गायों का संहार किया था। इस धार्मिक कुंड में गौ पापमोचन की प्रक्रिया को पवित्र माना गया है, जहां दूर-दूर से लोग पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
अहिरवारा: गौ पालकों का केंद्र 🐄
अहिरवारा का नाम भी इस क्षेत्र में गौ पालन की परंपरा से ही जुड़ा है। यह गांव पहले अहिर बाड़ा के नाम से जाना जाता था, जहां अहिर समुदाय के लोग रहते थे और गौ पालन में संलग्न रहते थे। अब इसे अहिवारा के नाम से जाना जाता है और यह एक प्रमुख कस्बा बन गया है।
प्राकृतिक और भूगर्भशास्त्रीय संबंध 🌍
एनआईटी रायपुर के भू-गर्भशास्त्री डॉ. एमडी पटेल का कहना है कि यह क्षेत्र मैकाल पर्वत श्रृंखला से घिरा हुआ है। यहां के पत्थरों पर पाए गए खुरों के निशान यह संकेत देते हैं कि यहां प्राचीन काल में गायें विचरण करती रही होंगी। पत्थरों का यह संरचना और इन पर गायों के खुरों के निशान हमें इस क्षेत्र के प्राकृतिक और पौराणिक महत्व की ओर संकेत करते हैं।
गौ तीर्थ की पौराणिक महत्ता ✨
स्थानीय पंडित मनोज पांडेय का मानना है कि यह क्षेत्र गौ तीर्थ के रूप में जाना जाता था और यहां की पौराणिक कथाएं इस बात की पुष्टि करती हैं। वे कहते हैं कि इन गांवों के नाम केवल संयोगवश नहीं, बल्कि गायों के प्रति सम्मान और श्रद्धा के प्रतीक हैं। ये सभी नाम गौ माता के प्रति यहां के लोगों की आस्था को दर्शाते हैं, जो समय के साथ अनमोल धरोहर बन गए हैं।
गोवर्धन पूजा और मातर का महत्व 🪔
दीपावली का पर्व केवल लक्ष्मी पूजा के लिए ही नहीं, बल्कि गायों की पूजा के लिए भी जाना जाता है। खासतौर पर गांवों में गोवर्धन पूजा और इसके अगले दिन मातर का उत्सव मनाया जाता है, जो गायों और पशुधन की पूजा का पर्व होता है। मान्यता है कि इस पूजा से परिवार को समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
दुर्ग जिले का अनोखा पौराणिक रहस्य 🏛️
दुर्ग जिले में बसे इन गांवों के नाम और गायों से जुड़ी कथाएं हमें इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और पौराणिक युग से जुड़े होने का आभास कराती हैं। नंदिनी गाय से जुड़ी यह कथाएं और इस क्षेत्र में पाए गए खुरों के निशान हमें हमारी धरोहर और सांस्कृतिक परंपराओं की याद दिलाते हैं, जो अनंत काल तक हमारे समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।
