📍 The CG ख़बर | रायपुर, 4 अप्रैल।
कल्पना कीजिए एक ऐसे जमींदार की, जो ब्रिटिश काल में सफेद घोड़ों वाली बग्गी पर सैनिकों के साथ शाही जुलूस निकालता था, दशहरा मनाता था, लाखों-करोड़ों की संपत्ति का मालिक था—लेकिन अंत में सब कुछ समाज को सौंप दिया। न कोई संतान, न कोई निजी सुख—सिर्फ छत्तीसगढ़ की मिट्टी और उसके लोगों के लिए असीम त्याग। यही हैं छत्तीसगढ़ के “भामाशाह” कहे जाने वाले दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल।
आज जब आप AIIMS Raipur, Indira Gandhi Krishi Vishwavidyalaya (IGKV) या डीकेएस सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में जाते हैं, तो शायद ही सोचते हों कि इनकी नींव एक अकेले माटीपुत्र की दानशीलता पर टिकी है। दाऊ जी ने हजारों एकड़ जमीन और करोड़ों रुपये (आज की कीमत में सैकड़ों करोड़) समाज को समर्पित कर दिए।
🟨 जन्म और प्रारंभिक जीवन
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल का जन्म 4 अप्रैल 1876 को भाटापारा के निकट तरेंगा गांव (तत्कालीन बिलासपुर जिला, वर्तमान बलौदाबाजार-भाटापारा) में हुआ था। उनके पिता विशेष्वर नाथ (बिसेसर नाथ) और माता पार्वती देवी थीं। परिवार ताहुतदारी (जमींदारी) परंपरा से जुड़ा था, जिसकी नींव 1828 में उनके दादा ने रखी थी।
1903 में, मात्र 27 वर्ष की आयु में, पिता के निधन के बाद उन्होंने पूरी जमींदारी संभाली। उस समय परिवार पर दो लाख रुपये से अधिक का कर्ज था, लेकिन अपनी सूझबूझ और प्रशासनिक क्षमता से उन्होंने न सिर्फ कर्ज चुकाया, बल्कि ताहुतदारी को समृद्ध बनाया।
🟥 ब्रिटिश काल की उपाधियाँ और समृद्धि
वर्षउपाधिकारण1911रायसाहब प्रशासनिक योगदान1918 रायबहादुर सामाजिक प्रभाव1944 दीवान बहादुर लोकसेवा और दानशीलता
1937 में वे 70,000 रुपये से अधिक वार्षिक राजस्व चुकाते थे, जो उस दौर में उनकी अत्यधिक समृद्धि का प्रमाण था। दशहरा के अवसर पर उनका सफेद घोड़ों वाली बग्गी और सैनिकों के साथ शाही जुलूस क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र होता था।
🟩 दान की अमर विरासत: स्वास्थ्य, शिक्षा और संकट मोचन
🏥 स्वास्थ्य क्षेत्र में योगदान
1944 में डीकेएस (सिल्वर जुबली) अस्पताल के लिए उन्होंने—
➡️65 एकड़ भूमि
➡️₹1.25 लाख नकद (आज लगभग 70 करोड़ के बराबर)
➡️7 भवनों का निर्माण
👉 यही भूमि आगे चलकर AIIMS रायपुर (पूर्व टीबी सैनेटोरियम क्षेत्र) का आधार बनी।
👉 कुल मिलाकर 323 एकड़ भूमि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दान की गई।
🌾 शिक्षा और कृषि में ऐतिहासिक योगदान
लाभांडी क्षेत्र में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) के लिए उन्होंने—
➡️1729 एकड़ भूमि दान की
➡️₹1.12 लाख नकद (आज लगभग 62 करोड़) – गरीब छात्रों के हॉस्टल निर्माण हेतु
👉 कुल मिलाकर 1700 एकड़ से अधिक भूमि शिक्षा और कृषि के लिए समर्पित की गई, जिसकी आज की कीमत 1000 करोड़ रुपये से अधिक आंकी जाती है।
🌊 संकट के समय सेवा
जब-जब समाज संकट में आया, दाऊ जी ने खुलकर मदद की—
➡️भाटापारा में भीषण अकाल के दौरान कल्याण सागर जलाशय का निर्माण, जिससे हजारों लोगों और मवेशियों की जान बची
➡️Bihar के विनाशकारी भूकंप और वर्धा की बाढ़ में आर्थिक सहायता
➡️नागपुर में लेडी इरविन अस्पताल और केंद्रीय महिला कॉलेज के निर्माण में सहयोग
🟨 सर्वधर्म समभाव और अन्य दान
दाऊ जी के दान की सबसे बड़ी विशेषता थी—कोई भेदभाव नहीं।
उन्होंने हर धर्म, हर वर्ग के लिए समान भाव से कार्य किया—
➡️रायपुर के जगन्नाथ मंदिर के लिए पूरा खैरा गांव दान
➡️गौशालाएं और दाऊ रामसिंह पशु चिकित्सालय ➡️जनकनंदिनी और सरजावती देवी के नाम पर धर्मशालाएं
➡️बहन कुंती बाई के नाम पर कालीबाड़ी स्कूल, पुस्तकालय
➡️मंदिरों के साथ-साथ चर्च के लिए भी भूमि दान
👉 यह दर्शाता है कि उनके लिए मानवता ही सबसे बड़ा धर्म था।
🟥 निजी जीवन: संतानहीन, लेकिन विरासत अमर
दाऊ जी का विवाह जनकनंदिनी देवी और सरजावती देवी से हुआ, लेकिन उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ। इसके बावजूद उन्होंने पूरे समाज को अपना परिवार माना।
🟦 उनकी पुण्यतिथि 13 फरवरी को और
🎂 जयंती 4 अप्रैल को दानशीलता दिवस के रूप में मनाई जाती है।
🟩 आज की मांग और स्मृति
छत्तीसगढ़ अग्रवाल समाज लगातार मांग कर रहा है कि राज्य का सर्वोच्च सम्मान—
👉 “दानवीर दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल राज्य अलंकरण”
या
👉 “भामाशाह पुरस्कार”
उनके नाम पर दिया जाए। भाटापारा में उनकी प्रतिमा स्थापित हो चुकी है, लेकिन उनकी स्मृति को और व्यापक स्तर पर स्थापित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
🟨 एक अमर संदेश
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने अपने जीवन से यह साबित कर दिया कि— 👉 “धन का असली मूल्य संग्रह में नहीं, बल्कि समाज के कल्याण में है।”
आज की पीढ़ी के लिए वे एक प्रेरणा हैं कि दान की संस्कृति को जीवित रखा जाए।
“दान की यह मिसाल सदियों तक याद रहेगी…”
