The CG ख़बर | Bhilai | दुर्ग–भिलाई की औद्योगिक धड़कनों के बीच एक ऐसी सियासी हलचल आकार ले रही है, जो केवल स्थानीय नहीं, बल्कि सैकड़ों किलोमीटर दूर पूर्व की राजनीति को भी प्रभावित करने का दावा करती है। यहां बड़ी संख्या में बसे पश्चिम बंगाल मूल के स्वर्णकार समाज के कारीगर अब सिर्फ मेहनतकश हाथ नहीं रह गए—वे एक संभावित “चुनावी फैक्टर” के रूप में उभर रहे हैं।
◼️स्वर्णकार समाज: परिश्रम से राजनीति तक का सफर
दुर्ग–भिलाई में वर्षों से कार्यरत यह स्वर्णकार समाज मूलतः कोलकाता और पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों से आकर यहां बस गया। आभूषण निर्माण की बारीक कला में दक्ष ये कारीगर अब एक नई भूमिका में हैं—मतदाता और राजनीतिक समीकरण बदलने वाले समूह।
स्थानीय स्तर पर केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से प्रभावित यह वर्ग धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में खड़ा होता दिख रहा है। यही समर्थन अब सीमाओं को पार कर पश्चिम बंगाल की सियासत में दस्तक देने को तैयार है।
◼️कन्हैया सोनी की ‘मतदान मुहिम’: रणनीति या समर्पण?
इस पूरे अभियान के केंद्र में हैं भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य और चैंबर ऑफ कॉमर्स के मुख्य सलाहकार कन्हैया सोनी।
उन्होंने न केवल स्वर्णकार समाज को संगठित किया, बल्कि अपने निजी संसाधनों से बसों की व्यवस्था कर सैकड़ों लोगों को उनके मूल निवास—कोलकाता—भेजने की पहल भी की।
रवाना होने से पहले माहौल किसी राजनीतिक रैली से कम नहीं था—“जय श्री राम” और “भाजपा जिंदाबाद” के नारों के बीच यह काफिला निकला, मानो यह सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि एक संकल्प यात्रा हो।
कन्हैया सोनी का साफ कहना है:
“राष्ट्रहित में हर वोट की कीमत है। हमारे स्वर्णकार भाई-बहन कोलकाता जाकर भाजपा के पक्ष में मतदान करेंगे और विकास की धारा को मजबूत करेंगे।”
🟥पश्चिम बंगाल की सियासत में असर ?
पश्चिम बंगाल, विशेषकर कोलकाता की विधानसभा सीटों पर लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा है। ऐसे में बाहरी राज्यों में कार्यरत मूल मतदाताओं को संगठित कर वापस मतदान के लिए भेजना—यह रणनीति भाजपा के लिए “गेम चेंजर” साबित हो सकती है या नहीं, यह तो परिणाम तय करेंगे, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चा तेज है।
◼️राजनीतिक हलकों में सराहना और सवाल
एक ओर इस पहल को संगठन के प्रति निष्ठा और जमीनी सक्रियता का उदाहरण बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहे हैं—
क्या यह सिर्फ एक सामाजिक प्रयास है या एक सोची-समझी चुनावी रणनीति?
✍️निष्कर्ष: वोट की यात्रा या प्रभाव की राजनीति?
दुर्ग–भिलाई से कोलकाता तक चल रही यह ‘मतदान यात्रा’ भारतीय लोकतंत्र की एक दिलचस्प तस्वीर पेश करती है—जहां काम की तलाश में घर छोड़ने वाले लोग, चुनाव के समय फिर अपने मूल की ओर लौटते हैं, और अपने वोट से सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं।
अब देखना यह होगा कि कन्हैया सोनी की यह पहल महज प्रतीक बनकर रह जाती है या सचमुच पश्चिम बंगाल के चुनावी नक्शे पर कोई नई लकीर खींचती है।
