खटखटाते रहे अस्पताल का दरवाजा, गेट पर दिया बच्चे को जन्म  🟥 नवजात की मौत – मां गंभीर

खटखटाते रहे अस्पताल का दरवाजा, गेट पर दिया बच्चे को जन्म  🟥 नवजात की मौत – मां गंभीर

The CG ख़बर | सूरजपुर। जिस अस्पताल के दरवाजे पर जिंदगी बचाने की उम्मीद लेकर एक परिवार पहुंचा था, उसी अस्पताल के गेट के सामने एक नवजात ने जन्म लिया और कुछ ही देर बाद उसकी सांसें थम गईं। प्रसव पीड़ा से कराहती मां को समय पर चिकित्सा सहायता मिलने के बजाय अस्पताल के बाहर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। अब प्रसूता की हालत गंभीर बताई जा रही है। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के गणेशपुर स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) की यह घटना ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

परिजनों का आरोप है कि वे मदद के लिए अस्पताल का दरवाजा खटखटाते रहे, आवाज लगाते रहे, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। आखिरकार अस्पताल के गेट के सामने ही प्रसव हो गया। घटना सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने कार्रवाई करते हुए दो स्वास्थ्यकर्मियों को निलंबित कर दिया है।

◼️ आधी रात को अस्पताल पहुंचा परिवार, लेकिन नहीं खुला दरवाजा

जानकारी के अनुसार, गणेशपुर (श्रीनगर) निवासी अनिल कुमार सारथी की गर्भवती पत्नी को बुधवार रात प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिवार बिना देर किए महिला को लेकर रात करीब 11 बजे गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचा। परिजनों को उम्मीद थी कि अस्पताल में चिकित्सकीय सहायता मिलेगी और मां-बच्चे की जान सुरक्षित रहेगी।

लेकिन परिजनों का आरोप है कि अस्पताल का मुख्य दरवाजा बंद था। उस समय वहां डॉक्टर या नर्स भी मौजूद नहीं थे। परिवार के सदस्य काफी देर तक दरवाजा खटखटाते रहे और स्वास्थ्यकर्मियों को आवाज लगाकर मदद मांगते रहे, लेकिन उन्हें तत्काल सहायता नहीं मिल सकी।

इस बीच महिला की प्रसव पीड़ा लगातार बढ़ती गई। हालात ऐसे हो गए कि अस्पताल के भीतर चिकित्सा सुविधा मिलने का इंतजार कर रही महिला को गेट के सामने ही बच्चे को जन्म देना पड़ा।

जन्म के कुछ देर बाद नवजात की मौत, मां की हालत गंभीर

प्रसव के बाद परिवार की खुशियां मातम में बदल गईं। परिजनों के मुताबिक, जन्म के कुछ देर बाद ही नवजात की मौत हो गई। वहीं, प्रसूता की हालत गंभीर होने पर उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रामानुजनगर ले जाया गया, जहां उसका उपचार जारी है।

एक परिवार जिस उम्मीद के साथ अस्पताल पहुंचा था, वहां से उसे ऐसा दर्द मिला, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। परिजनों का आरोप है कि यदि समय पर चिकित्सा सहायता मिल जाती, तो शायद स्थिति अलग हो सकती थी।

हालांकि, नवजात की मौत के वास्तविक कारणों और समय पर उपचार मिलने की स्थिति में संभावित परिणाम को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच और चिकित्सकीय तथ्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है। लेकिन प्रसव जैसी आपात स्थिति में अस्पताल के बाहर महिला को बच्चे को जन्म देना पड़ा—यह अपने आप में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

सवालों के घेरे में ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था

गणेशपुर की घटना ने स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्थाओं को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।

रात 11 बजे अस्पताल का दरवाजा बंद क्यों था?

प्रसव पीड़ा से जूझती महिला को तत्काल चिकित्सकीय सहायता क्यों नहीं मिली?

क्या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में रात के समय ड्यूटी पर स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित थी?

यदि ग्रामीण क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में आपात स्थिति के दौरान सहायता नहीं मिलेगी, तो मरीज आखिर कहां जाएंगे?

क्या केवल निलंबन की कार्रवाई से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकेगी?


प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ग्रामीण आबादी के लिए चिकित्सा सेवाओं की पहली महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। विशेषकर गर्भवती महिलाओं के लिए प्रसव के दौरान समय पर चिकित्सा सहायता मिलना बेहद अहम है। ऐसे में रात के समय स्वास्थ्य केंद्र की उपलब्धता और आपात स्थिति में कर्मचारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना स्वास्थ्य विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

यह मामला केवल दो कर्मचारियों के निलंबन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। घटना के कारणों की निष्पक्ष जांच, ड्यूटी व्यवस्था की समीक्षा और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में चौबीसों घंटे आवश्यक सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, अस्पताल के सामने प्रदर्शन

घटना की जानकारी सामने आने के बाद ग्रामीणों में नाराजगी फैल गई। ग्रामीणों ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गणेशपुर के सामने विरोध प्रदर्शन कर जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। अस्पताल के गेट पर ताला लगाकर प्रदर्शन किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।

पीड़िता के पति ने भी जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। ग्रामीणों की नाराजगी की मुख्य वजह यह है कि जिस स्वास्थ्य केंद्र से आपातकाल में तत्काल मदद मिलने की उम्मीद की जाती है, वहां प्रसव पीड़ा से जूझती महिला को कथित तौर पर समय पर सहायता नहीं मिल पाई।

ग्रामीणों की मांग है कि मामले की गंभीरता से जांच की जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि घटना के समय स्वास्थ्य केंद्र में तैनात कर्मचारियों की क्या जिम्मेदारी थी तथा महिला को तत्काल उपचार क्यों नहीं मिल सका।

◼️ CMHO ने दो स्वास्थ्यकर्मियों को किया निलंबित

मामले की गंभीरता को देखते हुए सूरजपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. प्रशांत कुमार सिंह ने कार्रवाई की है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गणेशपुर में पदस्थ ग्रामीण चिकित्सा सहायक राजेश पटेल और सहायक नर्स मिडवाइफ (ANM) प्रमिला गिरी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

CMHO डॉ. प्रशांत कुमार सिंह के अनुसार, घटना की जानकारी मिलते ही मामले को गंभीरता से लिया गया और जांच कराई गई। जांच में लापरवाही सामने आने पर दोनों स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई।

हालांकि, इस कार्रवाई के बाद भी घटना से जुड़े सभी सवालों का जवाब मिलना जरूरी है। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि अस्पताल का दरवाजा बंद होने की परिस्थितियां क्या थीं, संबंधित कर्मचारियों की ड्यूटी क्या थी और प्रसूता को समय पर सहायता उपलब्ध कराने में कहां चूक हुई।

◼️ नवजात की मौत के बाद बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी?

गणेशपुर की यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था के उस बुनियादी उद्देश्य पर सवाल खड़ा करती है, जिसके तहत किसी भी मरीज को आपात स्थिति में समय पर उपचार मिलना चाहिए। गर्भवती महिला और उसके गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा के लिए प्रसव के दौरान त्वरित चिकित्सा सहायता विशेष महत्व रखती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि रात के समय प्रसव पीड़ा से जूझती महिला को अपने ही गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मदद नहीं मिलेगी, तो ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा?

दो स्वास्थ्यकर्मियों का निलंबन तत्काल प्रशासनिक कार्रवाई जरूर है, लेकिन इस हृदयविदारक घटना का वास्तविक जवाब निष्पक्ष जांच, जिम्मेदारी तय करने और स्वास्थ्य सेवाओं में जरूरी सुधार से ही मिलेगा। अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में आगे क्या कदम उठाता है और क्या ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है।

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