The CG ख़बर | रायपुर | 15 अप्रैल 2026 को रायपुर के महानदी भवन में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में कैबिनेट बैठक चल रही है। मंत्रियों के चेहरे गंभीर हैं। अचानक एक प्रस्ताव आता है — “समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए!”
सबकी सांसें थम जाती हैं। कुछ मंत्रियों के मन में सवाल घूमने लगते हैं — धर्म स्वतंत्रता विधायक के बाद , क्या हम सच में जोखिम ले रहे हैं ? 32% से ज्यादा आदिवासी आबादी वाला राज्य, जहाँ हर गाँव के रिवाज अलग हैं… क्या हम उनकी परंपराओं पर चोट कर रहे हैं? मुस्लिम संगठन क्या कहेंगे? क्या यह राष्ट्रीय एकता लाएगा या नया विवाद खड़ा कर देगा?
…….. पर फैसला हो गया |जल्द ही प्रदेश में लागू होगा UCC , एक देश एक संविधान की भावना वाला कानून ” समान नागरिक संहिता ” |
🟥 【उच्चस्तरीय समिति का गठन】
सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट की जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है। मुख्यमंत्री को बाकी सदस्य नामित करने का अधिकार दिया गया। यह समिति आम नागरिकों, संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों से सुझाव मांगेगी (संभवतः एक वेब पोर्टल के जरिए) और फिर व्यापक ड्राफ्ट तैयार करके कैबिनेट व विधानसभा में पेश करेगी।
🟥 【UCC आखिर है क्या?】
भारत में आज भी एक ही छत के नीचे अलग-अलग कानून चल रहे हैं। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना और रखरखाव जैसे व्यक्तिगत मामलों में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और आदिवासी — हर समुदाय का अपना अलग पर्सनल लॉ है। UCC का मतलब है इन सभी को खत्म करके एक समान नागरिक संहिता लागू करना, जिसमें धर्म, जाति या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा।
🟥 【संविधान में क्या प्रावधान है】
यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में निर्देशक सिद्धांत के रूप में दर्ज है, जिसमें कहा गया है कि “राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा”।
🟥 【UCC की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि】
UCC की मांग की शुरुआत कब और कैसे हुई?
UCC की जड़ें ब्रिटिश काल में हैं, जब अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून बनाए गए थे। 1941 में बी.एन. राव समिति (हिंदू लॉ कमिटी) ने हिंदू कानूनों में सुधार और महिलाओं को समान अधिकार देने की सिफारिश की।
🟥 【संविधान सभा में बहस】
संविधान सभा में (1947-48) इसकी औपचारिक बहस हुई। डॉ. बी.आर. अंबेडकर, के.एम. मुंशी, मिनू मसानी ने इसका समर्थन किया, जबकि कुछ मुस्लिम सदस्यों ने विरोध किया। अंत में इसे मौलिक अधिकार की बजाय निर्देशक सिद्धांतों में रखा गया।
🟥 【शाह बानो केस: टर्निंग पॉइंट】
शाह बानो केस (1985) — UCC की बहस का टर्निंग पॉइंट
73 वर्षीय शाह बानो को उनके पति ने तलाक दे दिया और रखरखाव से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 125 CrPC के तहत उन्हें रखरखाव देने का आदेश दिया और कहा कि यह कानून सभी नागरिकों पर लागू होता है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। कोर्ट ने UCC को “मृत अक्षर” (dead letter) बताया और राष्ट्रीय एकता के लिए इसे लागू करने की सिफारिश की।
🟥 【राजनीतिक मोड़】
लेकिन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम पास करके इस फैसले को निष्प्रभावी कर दिया। इससे देशव्यापी बहस छिड़ गई।
🟥 【सुप्रीम कोर्ट की बाद की टिप्पणियाँ】
बाद के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने सरला मुद्गल केस (1995) और अन्य मामलों में भी UCC पर जोर दिया। 2015-16 में कोर्ट ने व्यक्तिगत कानूनों में “पूरी तरह भ्रम” की बात कही और केंद्र से UCC पर राय मांगी।
🟥 【UCC की आवश्यकता क्यों?】
UCC लागू करना क्यों आवश्यक है?
लिंग समानता और महिलाओं के अधिकार: वर्तमान कानूनों में महिलाओं के साथ भेदभाव है — उत्तराधिकार, तलाक, बहुविवाह आदि में। UCC से सभी को समान अधिकार मिलेंगे।
राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता: अलग-अलग कानून समाज को “वाटरटाइट कंपार्टमेंट” में बांटते हैं। UCC से “एक राष्ट्र, एक कानून” की भावना मजबूत होगी और अनुच्छेद 14 (समानता) सार्थक बनेगा।
कानूनी सरलता: अंतर-धार्मिक विवाह, संपत्ति विवाद आदि में जटिलताएं कम होंगी। अदालतों का बोझ घटेगा।
आधुनिकता और सामाजिक सुधार: सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में UCC को राष्ट्रीय एकीकरण का साधन बताया है।
🟥 【जहां लागू हो चुका है】
उत्तराखंड (जनवरी 2025) और गुजरात (मार्च 2026) में UCC लागू होने के बाद इन लाभों की झलक दिखने लगी है।
🟥 【विरोध के कारण】
UCC का विरोध क्यों हो रहा है?
मुख्य विरोध मुस्लिम संगठनों (जैसे AIMPLB) और कुछ आदिवासी समूहों से आ रहा है:
धार्मिक स्वतंत्रता का हनन: वे इसे शरिया या अपने व्यक्तिगत कानून में हस्तक्षेप मानते हैं और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का हवाला देते हैं।
सांस्कृतिक पहचान पर हमला: अल्पसंख्यक इसे अपनी पहचान पर हमला और बहुसंख्यकवाद मानते हैं।
आदिवासी चिंताएं: छत्तीसगढ़ में 32% से ज्यादा आदिवासी आबादी है। वे अपने रिवाजों (विवाह, संपत्ति) के हनन से डरते हैं और PESA एक्ट व छठी अनुसूची का जिक्र करते हैं।
🟥 【विरोधियों का तर्क】
विरोधी कहते हैं कि UCC “एक समानता” के नाम पर भारत की विविधता को मिटा देगा।
🟥 【BJP का दृष्टिकोण】
BJP के लिए UCC इतना महत्वपूर्ण क्यों?
BJP इसे अपनी मूल विचारधारा का हिस्सा मानती है, जो जनसंघ काल से चली आ रही है। पार्टी इसे राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के साथ अपनी तीन प्रमुख वादों में से एक मानती है। BJP के अनुसार UCC लैंगिक न्याय सुनिश्चित करेगा और “एक राष्ट्र, एक कानून” की भावना को मजबूत करेगा।
🟥 【देशभर में प्रदर्शन】
UCC विरोध में कहां-कहां प्रदर्शन हुए?
विरोध मुख्यतः मुस्लिम संगठनों और आदिवासी समूहों द्वारा हुआ है — पूर्वोत्तर राज्यों (नागालैंड, मेघालय), उत्तराखंड, गुजरात, दिल्ली, मध्य प्रदेश और झारखंड में। ये प्रदर्शन ज्यादातर शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ जगहों पर पुलिस हस्तक्षेप भी हुआ।
🟥 【छत्तीसगढ़ में चुनौती】
छत्तीसगढ़ में UCC की शुरुआत: क्या यह जरूरी है?
छत्तीसगढ़ में विविधता बहुत है — आदिवासी रिवाज, विभिन्न धर्म और संस्कृतियां। UCC से महिलाओं को समान अधिकार, कानूनी सरलता और राष्ट्रीय एकता मिल सकती है। लेकिन चुनौती भी बड़ी है। समिति को आदिवासी-मुस्लिम चिंताओं को ध्यान में रखकर ड्राफ्ट तैयार करना होगा।
✍️ 【निष्कर्ष】
UCC संविधान की भावना है। यह लंबे समय से लंबित सुधार है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में इसे लागू करने से पहले व्यापक चर्चा, सभी पक्षों की चिंताओं का समाधान और सहमति बनाना जरूरी है।
🟥 【आगे क्या होगा?】
अंततः UCC से भारत अधिक समान, न्यायपूर्ण और एकीकृत बनेगा — बशर्ते इसे सही तरीके से, संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाए।
यह प्रक्रिया अब शुरू हो चुकी है। समिति सुझाव लेगी, बहस होगी, शोर मचेगा। समय बताएगा कि छत्तीसगढ़ UCC से मजबूत बनेगा या नया असंतोष पैदा होगा।
🤔 【आपकी राय】
आप क्या सोचते हैं?
क्या सरकार ने सही कदम उठाया या सच में एक बड़ी मुसीबत मोल ले ली? अपनी राय जरूर बताएं। यह बहस अब पूरे छत्तीसगढ़ और देश में गूंजने वाली है।
◼️【डिस्क्लेमर】
(यह लेख उपलब्ध तथ्यों और ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है। कोई भी अंतिम कानूनी परिवर्तन विधानसभा और अदालतों के माध्यम से ही होगा।)
