ओजस्वी व्यक्तित्व रंगा हरि जी : जीवन, सेवा और प्रेरणा का अद्वितीय संगम

ओजस्वी व्यक्तित्व रंगा हरि जी : जीवन, सेवा और प्रेरणा का अद्वितीय संगम

ओजस्वी व्यक्तित्व रंगा हरि जी : जीवन, सेवा और प्रेरणा का अद्वितीय संगम

5 दिसंबर, 1930 को केरल के त्रिपुन्थरा गांव में जन्मे संघ के वरिष्ठ प्रचारक रंगा हरि का जीवन त्याग, समर्पण और राष्ट्र सेवा का अद्भुत उदाहरण है। उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो हर उम्र के व्यक्ति को प्रेरित करता था। अपने विचारों, लेखनी और संगठन कौशल से उन्होंने ना केवल संघ को सशक्त बनाया बल्कि समाज में एकता और राष्ट्रीयता का संदेश भी फैलाया।


बाल्यकाल से राष्ट्र सेवा तक की यात्रा

13 वर्ष की आयु में संघ से जुड़ने वाले रंगा हरि ने किशोरावस्था में ही राष्ट्र सेवा की राह चुन ली।

  • 1948: संघ पर प्रतिबंध के विरोध में सत्याग्रह किया और पांच महीने कन्नूर जेल में बिताए।
  • शिक्षा: स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रचारक बने और अपना जीवन पूरी तरह संघ के लिए समर्पित कर दिया।

उनकी नेतृत्व क्षमता और बौद्धिक कुशलता ने उन्हें संघ में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाने का अवसर दिया।


संघ में योगदान

रंगा हरि का संघ में योगदान उनके असाधारण संगठन कौशल और बौद्धिक नेतृत्व से परिपूर्ण था।

  • 1983: केरल के प्रांत प्रचारक बने।
  • 1990-2005: अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख के रूप में कार्य किया।
  • एशिया और ऑस्ट्रेलिया में संघ कार्य के विस्तार का नेतृत्व किया।

उनके नेतृत्व में केरल में संघ ने कठिन संघर्षों का सामना किया। कट्टरपंथी विचारधाराओं और राजनीतिक प्रतिरोध के बावजूद संघ को मजबूत बनाया।


संघर्षों में अदम्य साहस

केरल में तीन शक्तियां — ईसाई मिशनरी, मुस्लिम कट्टरपंथ और वामपंथी विचारधारा — संघ को खत्म करने के प्रयास में लगी थीं।

  • रंगा हरि ने भास्कर राव की नीति को आगे बढ़ाते हुए हिन्दुओं का मनोबल ऊंचा किया।
  • इस संघर्ष में कई स्वयंसेवकों ने प्राण न्यौछावर किए, पर संघ के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं हुआ।

इन कठिनाईयों को झेलते हुए उन्होंने समाज को एकजुट करने का काम किया।


लेखक, वक्ता और चिंतक

रंगा हरि केवल संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि एक ओजस्वी वक्ता और मौलिक लेखक भी थे।

  • उनकी 62 पुस्तकों ने समाज को नई दृष्टि दी।
  • श्री गुरुजी की जन्मशती पर ‘श्री गुरुजी समग्र’ को 12 खंडों में प्रकाशित कर ऐतिहासिक योगदान दिया।
  • उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था — मलयालम, हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, तमिल, कोंकणी, मराठी, बंगला, असमी

उनकी भाषण शैली रोचक और प्रेरणादायक थी। वे गहन विषयों को सरलता और हास्य के साथ प्रस्तुत करते थे।


प्रेरक व्यक्तित्व और अनुकरणीय जीवन

रंगा हरि के जीवन के कुछ प्रेरणादायक पहलू:

  1. सादगी और समर्पण:
    • वे वैष्णव परिवार से थे और सादगी से जीवन जीते थे।
    • कठिन परिस्थितियों में भी उनका धैर्य और समर्पण अडिग रहा।
  2. सभी के प्रिय:
    • संघ के बाहर भी विभिन्न विचारधाराओं के लोग उनका सम्मान करते थे।
    • नए लेखकों और कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करना उनकी खासियत थी।
  3. अंतिम इच्छा:
    • उन्होंने सार्वजनिक शमशान में दाह संस्कार और पास के जलाशय में अस्थि विसर्जन का निर्देश दिया।
    • उन्होंने भगवा वस्त्रों में दाह संस्कार से मना करते हुए इसे आदर्शों की शुद्धता बनाए रखने की प्रेरणा दी।

तीन संस्कृत श्लोकों में जीवन का सार

अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने तीन संस्कृत श्लोकों में अपने जीवन को सार्थक बताते हुए भगवान से प्रार्थना की कि उन्हें अगले जन्म में भी संघ कार्य करने का अवसर मिले।


सार

रंगा हरि का जीवन एक प्रेरणास्रोत है जो यह सिखाता है कि त्याग, सेवा और संगठन से व्यक्ति समाज और राष्ट्र को नई दिशा दे सकता है।
वे एक ओजस्वी वक्ता, प्रखर लेखक और अनुकरणीय चिंतक के रूप में सदा याद किए जाएंगे। उनका जीवन और कार्य सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

“रंगा हरि जैसे व्यक्तित्व युगों में जन्म लेते हैं, जो अपने विचारों और कार्यों से समाज को बदलने की क्षमता रखते हैं।”

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