Chhattisgarh: मुस्लिम समाज में गुस्सा: वक्फ बोर्ड अध्यक्ष के बयान पर विवाद, जानिए पूरा मामला

Chhattisgarh: मुस्लिम समाज में गुस्सा: वक्फ बोर्ड अध्यक्ष के बयान पर विवाद, जानिए पूरा मामला

Chhattisgarh: मुस्लिम समाज में गुस्सा: वक्फ बोर्ड अध्यक्ष के बयान पर विवाद, जानिए पूरा मामला

मुद्दा क्या है?

छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज के बयान ने प्रदेश के मुस्लिम समाज में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस बयान के अनुसार, मस्जिदों में होने वाली तकरीरों को पहले वक्फ बोर्ड से अनुमोदित कराना होगा। इस बयान को लेकर मुस्लिम समाज में नाराजगी बढ़ गई है।

वक्फ बोर्ड अध्यक्ष का बयान और विवाद की शुरुआत

डॉ. सलीम राज ने कहा कि मस्जिदों में होने वाली सामूहिक नमाज और तकरीरों में राजनीतिक मुद्दों पर बात नहीं होनी चाहिए। उन्होंने इस संदर्भ में जम्मू-कश्मीर और कवर्धा की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि मस्जिदें राजनीति का अड्डा नहीं बननी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि तकरीरों से पहले वक्फ बोर्ड से अनुमोदन लिया जाए।

व्हाट्सएप ग्रुप में विरोध और नाराजगी

यह बयान विभिन्न व्हाट्सएप ग्रुप्स में तेजी से फैल गया। मस्जिदों के मुतवल्लियों (प्रमुखों) ने इस बयान का कड़ा विरोध किया। उनका कहना है कि मस्जिदों में केवल धार्मिक शिक्षा और हदीस-कुरान की बात होती है। वहां राजनीति की कोई जगह नहीं होती।

राजनांदगांव के जामा मस्जिद मुतवल्ली हाजी रईस अहमद शकील ने स्पष्ट किया कि उन्हें इस तरह का कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ है और न ही इसकी जरूरत है।

वक्फ बोर्ड की सफाई: भ्रम फैलाने की कोशिश

मामले ने तूल पकड़ने पर वक्फ बोर्ड ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। वक्फ बोर्ड के सीईओ ने कहा कि ऐसा कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग भ्रम फैलाने के लिए इस मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। बोर्ड का इरादा केवल मस्जिदों में शांति और सामाजिक समरसता बनाए रखना है।

अध्यक्ष का यू-टर्न: बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया

डॉ. सलीम राज ने कहा, “हमने कोई आदेश जारी नहीं किया है। मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। मस्जिदों में तकरीर की स्वतंत्रता मौलाना और इमाम साहब को है। यह सुझाव केवल उन मुतवल्लियों के लिए था, जो मस्जिदों का दुरुपयोग कर रहे हैं।”

समाज का रुख: आक्रोश और असहमति

मुस्लिम समाज के लोग इस बयान से नाराज हैं। उनका मानना है कि मस्जिदों में धार्मिक तकरीरें होती हैं, न कि राजनीतिक। इसके अलावा, वक्फ बोर्ड द्वारा अप्रूवल की प्रक्रिया लागू करने का विचार उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप जैसा महसूस होता है।

मुद्दे के पीछे क्या है?

  1. धार्मिक स्वतंत्रता बनाम प्रशासनिक नियंत्रण:
    वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष का यह विचार धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों के बीच संतुलन बनाने के लिए है, लेकिन इससे समाज में असंतोष पैदा हो गया है।
  2. व्हाट्सएप ग्रुप का निर्माण:
    वक्फ बोर्ड ने यह निर्णय लिया कि एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया जाएगा, जहां मस्जिद से जुड़े निर्देश दिए जा सकें। यह ग्रुप केवल संवाद के लिए होगा, न कि तकरीरों पर नियंत्रण के लिए।

समाज की अपेक्षाएं और आगे का रास्ता

  • धार्मिक नेताओं की भूमिका:
    मुस्लिम समाज के उलमा और इमामों को मस्जिदों में दिए जाने वाले संदेशों को हदीस और कुरान की रोशनी में रखना चाहिए।
  • वक्फ बोर्ड की जिम्मेदारी:
    बोर्ड को इस मामले में पूरी पारदर्शिता रखनी होगी, ताकि समाज में कोई भ्रम न फैले।
  • . ख़बर का सार
  • मस्जिदें धार्मिक स्थल हैं, जहां समाज को सही मार्ग दिखाने की कोशिश की जाती है। वक्फ बोर्ड और मुस्लिम समाज को इस मुद्दे पर आपसी बातचीत और संवाद के जरिए समाधान निकालने की जरूरत है।

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