रायपुर/छत्तीसगढ़। प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की कवायद के बीच कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के बयान पर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। बैज द्वारा UCC को लेकर आदिवासी समाज के अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण पर सवाल उठाए जाने के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, ओबीसी मोर्चा कन्हैया सोनी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
कन्हैया सोनी ने कहा कि कांग्रेस और उसके प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज लगातार तथ्यहीन मुद्दों को राजनीतिक रंग देने का प्रयास कर रहे हैं। उनका आरोप है कि कांग्रेस का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों में भ्रम पैदा करना और भाजपा सरकारों को बदनाम करना रह गया है। जनता अब कांग्रेस की इस राजनीति को समझ चुकी है, यही कारण है कि कांग्रेस आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
“चर्चा में बने रहने के लिए तथ्यहीन बयान देते हैं दीपक बैज”
कन्हैया सोनी ने आरोप लगाया कि दीपक बैज UCC के नाम पर आदिवासी समाज में भय और भ्रम पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे बयान देने से पहले कांग्रेस नेताओं को उन राज्यों के कानूनों का अध्ययन करना चाहिए, जहां UCC लागू हो चुका है या विधानसभा से पारित हो चुका है।
उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी हमेशा आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रही है। UCC को लेकर भी जिन राज्यों में कानून बने हैं, वहां अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
क्या कहा था दीपक बैज ने?
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा था कि राज्य में UCC लागू होने पर आदिवासियों के हितों और अधिकारों का हनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे के तहत आदिवासियों पर UCC थोपने का प्रयास कर रही है।
बैज ने सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की थी कि UCC से आदिवासी समाज को बाहर रखा जाएगा या नहीं। उन्होंने पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में पंचायतों के अधिकार, आदिवासियों की जमीन, भू-राजस्व संबंधी प्रावधानों और बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, अबुझमाड़िया, भुजिया और पांडा जैसी संरक्षित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों को लेकर भी सवाल उठाए।
बस्तर की जमीनों को लेकर बैज ने आरोप लगाया था कि नक्सलवाद खत्म होने की घोषणा के बाद भाजपा समर्थित उद्योगपतियों की नजर आदिवासियों की जमीनों पर है और आदिवासी हितों की कीमत पर उद्योगपतियों के हितों को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।
कन्हैया सोनी का पलटवार— पहले BJP शासित इन राज्यों के प्रावधान देखिए
कन्हैया सोनी ने कहा कि यदि UCC का उद्देश्य आदिवासी समाज के अधिकारों और संस्कृति को समाप्त करना होता, तो भाजपा शासित राज्यों में अनुसूचित जनजातियों को UCC से स्पष्ट छूट क्यों दी जाती?
उन्होंने दीपक बैज के बयान के जवाब में उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात और असम के उदाहरण प्रस्तुत किए।
◼️उत्तराखंड में आदिवासियों को UCC से छूट
उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जहां UCC लागू हुआ। विधानसभा से पारित कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 27 जनवरी 2025 से लागू किया गया। इसमें अनुसूचित जनजातियों को स्पष्ट रूप से UCC के दायरे से बाहर रखा गया है।
इसका अर्थ है कि आदिवासी समुदायों के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य व्यक्तिगत मामलों में उनकी प्रथागत व्यवस्थाओं को सामान्य UCC प्रावधानों से अलग रखा गया है।
◼️मध्य प्रदेश में भी ST समुदाय बाहर
मध्य प्रदेश विधानसभा ने 21 जुलाई 2026 को UCC विधेयक पारित किया। इसमें संविधान के अनुच्छेद 342 और 366(25) के अंतर्गत आने वाली अनुसूचित जनजातियों को छूट दी गई है।
कन्हैया सोनी का कहना है कि मध्य प्रदेश जैसे बड़े आदिवासी आबादी वाले राज्य में भी ST समुदायों को अलग व्यवस्था दी गई है, ऐसे में छत्तीसगढ़ में UCC के नाम पर आदिवासी समाज को डराने की राजनीति उचित नहीं है।
◼️गुजरात और असम में भी आदिवासियों को छूट
गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पारित किया, जिसमें अनुसूचित जनजातियों को UCC के दायरे से बाहर रखा गया है। साथ ही संविधान के Part XXI के तहत संरक्षित प्रथागत अधिकारों वाले समूहों को भी विशेष संरक्षण दिया गया है।
वहीं 27 मई 2026 को असम विधानसभा ने UCC विधेयक पारित किया। असम में भी अनुसूचित जनजातियों को UCC से बाहर रखा गया है। छठी अनुसूची के तहत संरक्षित क्षेत्रों और आदिवासी समुदायों की प्रथागत व्यवस्थाओं को भी ध्यान में रखा गया है।
इस तरह उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात और असम—चारों राज्यों के उदाहरणों में अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष छूट का प्रावधान सामने आता है।
तो क्या UCC सिर्फ आदिवासियों पर लागू किया जा रहा है?
कन्हैया सोनी के अनुसार, इसका जवाब स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है।
UCC मुख्य रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बहुविवाह और लिव-इन संबंधों के पंजीकरण जैसे व्यक्तिगत कानूनों में समान व्यवस्था से संबंधित है। वहीं जिन राज्यों में UCC लागू हुआ अथवा पारित हुआ है, वहां ST समुदायों को स्पष्ट रूप से इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं को लेकर भय पैदा करने के बजाय कानून के वास्तविक प्रावधानों पर चर्चा होनी चाहिए।
“BJP ने हमेशा आदिवासी समाज के हितों और संस्कृति की रक्षा की”
कन्हैया सोनी ने कहा कि भाजपा की सरकारों ने आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों को हमेशा महत्व दिया है। UCC से संबंधित राज्यों के प्रावधान भी इसी बात को दर्शाते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस को वास्तव में आदिवासी समाज के अधिकारों की चिंता है, तो उसे राजनीतिक आरोपों के बजाय ठोस कानूनी प्रावधानों और तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए।
बस्तर में आदिवासी जमीनों पर उद्योगपतियों की नजर होने संबंधी दीपक बैज के आरोपों पर भी कन्हैया सोनी ने कहा कि ऐसे गंभीर आरोपों के साथ ठोस तथ्य, दस्तावेज और प्रमाण सामने रखे जाने चाहिए।
अब बहस का केंद्र— तथ्य या राजनीतिक आरोप?
छत्तीसगढ़ में UCC को लेकर प्रक्रिया अभी आगे बढ़ रही है। ऐसे में आदिवासी समाज के अधिकार, पांचवीं अनुसूची, भूमि अधिकार, प्रथागत कानून और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में बहस के केंद्र में रहेंगे।
कन्हैया सोनी की प्रतिक्रिया ने राजनीतिक बहस को एक अहम सवाल के सामने खड़ा कर दिया है— जब उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, गुजरात और असम में अनुसूचित जनजातियों के लिए UCC से विशेष छूट का प्रावधान किया गया है, तो क्या छत्तीसगढ़ में भी आदिवासी समाज के संवैधानिक और सांस्कृतिक अधिकारों की इसी तरह रक्षा की जाएगी?
फिलहाल UCC को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव तेज होता दिखाई दे रहा है। एक ओर कांग्रेस आदिवासी अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण को लेकर सवाल उठा रही है, तो दूसरी ओर भाजपा इन चार राज्यों के उदाहरणों को सामने रखकर कांग्रेस के आरोपों को तथ्यहीन बता रही है।
