The CG ख़बर । बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक अहम फैसले ने यह साफ कर दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) किसी व्यक्ति का निजी अधिकार नहीं, बल्कि पूरे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी के साथ जुड़ी होती है।
कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति इस जिम्मेदारी को निभाने में असफल रहता है, खासकर परिवार के आश्रित सदस्य जैसे सास की देखभाल नहीं करता, तो उसकी नौकरी तक रद्द की जा सकती है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एके प्रसाद ने स्पष्ट कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल एक व्यक्ति को लाभ देना नहीं, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक संकट से उबारना है।
यह मामला अंबिकापुर के एक परिवार से जुड़ा है। पुलिस विभाग में कांस्टेबल रहे घनश्याम तिवारी के निधन के बाद उनके बेटे अविनाश तिवारी को अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। वर्ष 2021 में अविनाश की भी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनकी पत्नी नेहा तिवारी को नौकरी दी गई।
हालांकि, यह नियुक्ति इस शर्त पर दी गई थी कि वह अपनी सास ज्ञांती तिवारी की देखभाल करेंगी। बाद में सास ने कोर्ट में आरोप लगाया कि नौकरी मिलने के बाद बहू का व्यवहार बदल गया और उन्हें नजरअंदाज कर आर्थिक रूप से बेसहारा छोड़ दिया गया।
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि नेहा तिवारी ने नियुक्ति के समय शपथ-पत्र में सास की देखभाल करने का वादा किया था। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए कहा कि सरकारी नौकरी के साथ जुड़ी शर्तों का पालन करना अनिवार्य है। अपने फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकारी नौकरी केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। यदि कोई व्यक्ति परिवार के प्रति अपने दायित्वों से पीछे हटता है, तो उसे नौकरी जैसे महत्वपूर्ण लाभ से भी हाथ धोना पड़ सकता है।
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