वंदे मातरम् पर कांग्रेस के रुख से गरमाई सियासत, कन्हैया सोनी ने कहा—देशविरोधी मानसिकता उजागर
नई दिल्ली। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देशभर में सियासी बहस तेज हो गई है। 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 के फैसले पर कायम रहने और पार्टी कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरे गाने की बात दोहराई। इसके बाद कांग्रेस विपक्ष के निशाने पर है।
इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए कन्हैया सोनी ने कहा कि संपूर्ण वंदे मातरम् का विरोध कांग्रेस की देश विरोधी और देश को बांटने वाली तुष्टिकरण की नीयत को दर्शाता है।
कौन है कन्हैया सोनी ?
कन्हैया सोनी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, ओबीसी मोर्चा छत्तीसगढ़ के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के प्रमुख सलाहकार, क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यापारी और समाजसेवी हैं।
1896: कांग्रेस के मंच से गूंजा था वंदे मातरम्
1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने सम्पूर्ण वंदे मातरम् का गायन किया गया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत अंग्रेजी शासन के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना का प्रमुख प्रतीक बन गया।
कन्हैया सोनी ने कहा कि जिस वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता आंदोलन में देशवासियों को जोड़ने का काम किया, आज उसी के संपूर्ण स्वरूप को लेकर कांग्रेस का रुख गंभीर सवाल खड़े करता है।
1937: तुष्टिकरण के लिए सीमित किया गया वंदे मातरम्?
1937 में वंदे मातरम् के कुछ अंतरों में धार्मिक संदर्भों को लेकर मुस्लिम नेताओं की आपत्तियों के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय सभाओं में पहले दो अंतरे गाने की सिफारिश की थी। कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय एकता और धार्मिक भावनाओं के सम्मान से जोड़ा, जबकि आलोचकों ने इसे तुष्टिकरण बताया।
कन्हैया सोनी ने सवाल किया कि 1937 की परिस्थितियां बदलने के बावजूद कांग्रेस करीब 89 साल पुराने फैसले पर आज भी क्यों कायम है? उन्होंने सवाल उठाया—“क्यों कांग्रेस पार्टी मुस्लिम लीग की भाषा बोल रही है?” जब इसी तुष्टिकरण की विचारधारा ने देश का विभाजन कराया है।
15 अगस्त: विवाद ने पकड़ा तूल
15 अगस्त 2026 को कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने आए। कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज किया, लेकिन विवाद थमा नहीं।
इसके बाद 19 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 के फैसले को फिर दोहरा दिया।
कन्हैया सोनी ने उठाया सीधा सवाल
कन्हैया सोनी ने कहा कि यदि वंदे मातरम् राष्ट्रगीत है, तो उसके संपूर्ण स्वरूप से परहेज क्यों? उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज भी किसी समुदाय की आपत्ति राष्ट्रीय प्रतीक के गायन की सीमा तय करेगी?
उनके मुताबिक, राष्ट्रीय प्रतीकों के मामले में राजनीतिक समीकरण नहीं, राष्ट्रहित सर्वोच्च होना चाहिए।
देशभर में बहस, कांग्रेस पर तुष्टिकरण के सवाल
वंदे मातरम् का मुद्दा अब केवल कांग्रेस-भाजपा की बयानबाजी तक सीमित नहीं है। राष्ट्रगीत, राष्ट्रीय अस्मिता और तुष्टिकरण की राजनीति को लेकर देशभर में बहस तेज है।
कांग्रेस अपने फैसले को ऐतिहासिक परंपरा और राष्ट्रीय एकता से जोड़ रही है, जबकि उसके आलोचक इसे वोट-बैंक की राजनीति बता रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल—1937 का फैसला 2026 में भी क्यों?
कन्हैया सोनी का आरोप है कि संपूर्ण वंदे मातरम् का विरोध कांग्रेस की देश विरोधी और तुष्टिकरण की मानसिकता को उजागर करता है। कांग्रेस इसे अपनी ऐतिहासिक नीति बताती है। ऐसे में बहस का केंद्र यही है— क्या राष्ट्रगीत के मामले में 89 साल पुराना राजनीतिक फैसला आज भी जारी रहना चाहिए?
वंदे मातरम्।
